वीर नर्मद साउथ गुजरात विष्वविद्यालय में ओशो चेयर (ओशो पीठ) स्थापना-समारोह में महान कथाकार श्री मोरारी बापु द्वारा उद्घाटन

वीर नर्मद साउथ गुजरात विष्वविद्यालय में ओशो चेयर (ओशो पीठ) स्थापना-समारोह में महान कथाकार श्री मोरारी बापु द्वारा उद्घाटन

वीर नर्मद साउथ गुजरात विश्वविद्यालय में ओशो चेयर (ओशो पीठ) स्थापना-समारोह में महान कथाकार श्री मोरारी बापु द्वारा उद्घाटन

भारत तथा अन्य अमेरिका के विश्वविद्यायलों में ओशो चेयर की स्थापना के लिए स्वामी सत्य वेदांत तथा कुछ ओशो प्रेमी काफी समय से प्रयास-रत रहे हैं, लेकिन इस कार्य के शुभारम्भ का गौरव प्राप्त हुआ वीर नर्मद साउथ गुजरात यूनिवर्सिटी को। इस वर्ष 22 जनवरी की प्रातः सूरत में वीएनएसजीयू के कन्वेंशन भवन में, लगभग 2500 ओशो प्रेमियों की उपस्थिति में, इसकी अधिकारिक रूप से स्थापना हुई। विश्व प्रसिद्ध कथाकार श्री मोरारी बापु ने एक भव्य समारोह में अपने विलक्षण संबोधन के साथ इसका उद्घाटन किया।

इस अवसर पर विश्वविधयालय  के कुलपति डा. दक्षेष ठक्कर, उपकुलपति डा. भास्कर रावल, स्वामी सत्य वेदांत (पूर्व-काल में ओशो मल्टीवर्सिटी के कुलपति), फिल्म-लेखक श्री कमलेश पांडेय तथा गुजरात के सुप्रसिद्ध शायर श्री शोभित देसाई मंच पर उपस्थित थे। ओशो पीठ उद्घाटन कार्यक्रम का शुभारम्भ मा सोनल द्वारा की गई वैदिक प्रार्थना से हुआ। स्वामी अजित ने वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी सूरत, ओशो लोटस चैरिटेबल ट्रस्ट-सूरत तथा ओशो वल्र्ड फाउंडेशन-दिल्ली, ओशो निसर्ग फाउंडेशन-धर्मशाला की ओर से वहां उपस्थित ओशो प्रेमियों और प्रन्शंकओं का स्वागत किया।

ओशो पीठ (चेयर) का अभिप्राय

विश्वभर में अनेक विश्वविद्यायलों में किसी महान व्यक्ति, जिसका मानवता की चेतना के विकास में किसी प्रकार का सृजनात्मक योगदान होता है, उसके विचारों और जीवन-दर्शन पर विद्यार्थियों को शोधकर्ता की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए, चेयर की स्थापना की जाती है, जिसे हम हिंदी भाषा में पीठ कहते हैं; जैसे स्वामी विवेकानंद पीठ, श्री अरविंद पीठ, महात्मा गांधी पीठ, संत कबीर पीठ… इत्यादि। ओशो आज के युगपुरुष हैं, संबुद्ध रहस्यदर्षी हैं। आज लाखों-करोड़ों लोग ओशो के विशाल साहित्य का अध्ययन कर रहे हैं। आज अनेक विद्यार्थी ओशो के बहु-आयामी जीवन-दर्शन और विचारों पर शोध करना चाहते हैं। इसलिए विश्वविद्यालयों में ओशो चेयर (ओशो पीठ) की स्थापना का कार्य बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। ओशो के साथ एक नया युग शुरू हुआ है।

ओशो-पीठ स्थापना कार्यक्रम के प्रारंभ में ओशो के मूल सन्देश को उनके वीडियों के माध्यम से प्रसारित किया गया। गुजरात तथा पूरे विश्व में श्री मोरारी बापु ने लाखों-करोड़ों लोगों के हृदय को स्पर्ष किया है और ये स्वनामधन्य कथाकार ओशो के अनन्य प्रेमी और प्रशंक्षक हैं। इसलिए उनके द्वारा ओशो-पीठ का उद्घाटन निश्चितित ही एक स्तुत्य घटना है।

समारंभ के अध्यक्ष वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी-सूरत के कुलपति डा. दक्षेष ठक्कर ने अपने वक्तव्य में कहाः हिंदुस्तान की भूमि ने बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, मीरा, रमण, टैगोर और ओशो जैसी अनेक विभूतियों को जन्म दिया है। इनकी वाणी, वाणी नहीं, एक-एक षब्द जीवन-मंत्र की तरह है। ओशो -पीठ की स्थापना के मूल में यह ख्याल था कि मोरारी बापु जैसे सक्षम महापुरुष की उपस्थिति में यह कार्य संपन्न हो।

स्वामी सत्य वेदांत जी ने ओशो-पीठ का मूल हेतु समझाते हुए कहाः ओशो महासूर्य हैं। ओशो हमारे जीवन को प्रकाषित करते हैं; हमारी संभावनाएं क्या हैं; उन पर प्रकाश डालते हैं। उनके विचार, उनकी देशनाओं के माध्यम से शिक्षा में क्रांति आएगी और ध्यान के माध्यम से मनुष्य का रूपांतरण होगा। वही सच्ची विद्या है जो हमें मुक्ति दिलाती है।

अतिथि-विषेष फिल्म लेखक श्री कमलेश पांडेय ने शिष्य-भाव के साथ अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा, मेरा पूरा जीवन ओशोमय है। अब तो मैं ओशो में खाता हूं, पीता हूं, सोता हूं जागता हूं, सांस लेता हूं। यह मेरी प्रतीति है कि आने वाले समय में हमारा इतिहास ‘ओशो के पहले और ओशो के बाद’ के रूप में लिखा जाएगा।

ओशो की परम चेतना को प्रणाम करते हुए श्री मोरारी बापु ने अपने वक्तव्य में कहा- ओशो को पढ़ते हुए उनकी मैंने आवाज़ सुनी। ओशो जैसी हिंदी विश्व में कोई नहीं बोल सकता। पुणे में मैंने उनका अंग्रेजी में प्रवचन सुना; उनके बोलने में नाद था, रहस्य था, उसका मैंने आनंद लिया। ओशो का स्वरूप चिदानंदमय है और मेरे अनुसार उनमें पांच तत्व प्रखरता से प्रकट होते हैं-तर्क, तत्व, तक (लम्हा, समय, क्षण), तप और तंत्र। ओशो को फैशन से सुनना, छुपकर सुनना परम तत्व का अपमान है। मैं खुल कर कहता हूं ओशो के बारे में बोलना आनंद है, साधना है, भजन है। ओशो की बातें युवा वर्ग तक पहंुचें यह आज की मांग है। ओशो की बात जब मैं कहता हूं तो लोग मेरी भी आलोचना करते हैं। मैं जानता हूं, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। लेकिन मुझे जो सही प्रतीत होता है, उसे मैं हृदय से स्वीकारता हूं। ओशो ने पृथ्वी पर हुए कितने ही अज्ञात संतों का नाम उजागर किया है, जिनका नाम तक भी हमें पता नहीं था।

‘‘पीठ बहुत से होते हैं-खंडपीठ, व्यासपीठ, ज्ञानपीठ और अब ओशोपीठ…। ओशो प्रेमियों से अनुरोध है कि आपको जहां-जहां अवसर मिले, ओशो के सन्देश और विचारों को फैलाएं। जहां भी बैठकर आप ओशो की चर्चा करेंगे, उसे व्यासपीठ नहीं, ओशोपीठ कहना।

ओशोपीठ के इस महत कार्य में भागीदार होने वाले मित्रों में ओशो फाउंडेशन दिल्ली के प्रेसीडेंट स्वामी अतुल आनंद, ओशो निसर्ग फाउंडेशन-धर्मषाला के ट्रस्टी स्वामी आनंद तथागत, ओशो वल्र्ड पत्रिका के संपादक स्वामी चैतन्य कीर्ति, स्वामी पूर्णानंद जी, भजन सम्राट पद्मश्री प्रहलाद टिपाणिया जी, सूरत जिला कलेक्टर, पुलिस कमिषनर, तथा देश के विभिन्न शहर के ओशो ध्यान केंद्रों के संचालक उपस्थित थे।

लंच के बाद समारोह में ओशो मस्ती की अनूठी बहार आयी, जिसमें चंडीगढ़ से आए स्वामी प्रेम अरूप के जीवंत-संगीत संकीर्तन तथा उनके बाद पूना से आए स्वामी प्रेम अनादि के सदाबहार कीर्तन से सभी उपस्थित ओशो प्रेमी खूब मस्ती से नाचे।

निष्चित ही यह एक अनूठा-अप्रतिम ओशो महोत्सव था जिसका श्रेय, ओशो लोटस ट्रस्ट के कर्मठ सदस्यों को जाता हैं। सभी ओशो प्रेमियों की ओर से उनके प्रति अहोभाव।



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